बिहार चुनाव 2025 से पहले मतदाता सूची की 'Special Intensive Revision' (SIR): क्या है यह प्रक्रिया और क्यों बना विवाद?
📍 प्रस्तावना बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव 2025 से पहले निर्वाचन आयोग (ECI) ने मतदाता सूची की "Special Intensive Revision (SIR)" प्रक्रिया शुरू की है। यह एक विशेष अभियान है जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को साफ, सटीक और अद्यतन बनाना है। हालांकि यह प्रक्रिया अब विवाद का कारण बन गई है। आइए जानते हैं कि यह प्रक्रिया क्या है, इससे जनता और सरकार को क्या लाभ और हानि हो सकते हैं, और इसका चुनाव पर क्या असर पड़ेगा।
आइए बिहार की 'Special Intensive Revision' (SIR) of Electoral Roll प्रक्रिया को पूरी तरह विस्तार से समझते हैं। यह मुद्दा इस समय राजनीतिक और कानूनी दोनों मोर्चों पर बहुत अहम बना हुआ है।
क्या है 'Special Intensive Revision' (SIR)?
Special Intensive Revision’ (SIR) एक विशेष अभियान है जिसे भारत निर्वाचन आयोग (ECI) किसी राज्य में मतदाता सूची को साफ और अद्यतन (update) करने के लिए शुरू करता है।
🧾 SIR का मुख्य उद्देश्य होता है:
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मृत लोगों के नाम हटाना
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दो बार पंजीकृत नामों को हटाना (duplicate entries)
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प्रवासी (जो राज्य से बाहर चले गए हैं) उनके नाम हटाना
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नए योग्य मतदाताओं का नाम जोड़ना
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मतदाता विवरण में त्रुटियों को ठीक करना (जैसे नाम की स्पेलिंग, जन्मतिथि आदि)
📅 बिहार में SIR कब और क्यों शुरू हुआ?
बिहार में यह प्रक्रिया जून 2025 से शुरू हुई। चुनाव आयोग का तर्क था कि:
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2024 के लोकसभा चुनाव में बिहार में अनावश्यक, दोहराए गए, मृत या ग़ैर-मौजूद वोटर बहुत अधिक संख्या में पाए गए।
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इसलिए 2025 में विधानसभा चुनाव से पहले यह ज़रूरी है कि मतदाता सूची को स्वच्छ और भरोसेमंद बनाया जाए।
📊 अब तक क्या हुआ है बिहार में इस प्रक्रिया के तहत?
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बिहार में कुल मतदाता: लगभग 7.89 करोड़
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अब तक "अस्थायी रूप से चिन्हित" वोटर जिन पर सवाल उठे हैं: 35.6 लाख
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मृत: 12.5 लाख
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प्रवासी (राज्य छोड़ चुके): 17.5 लाख
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दो बार नाम दर्ज: 5.5 लाख
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इन मतदाताओं को नोटिस दिया गया है कि वे प्रमाण देकर अपने नाम की पुष्टि करें, नहीं तो नाम हटाए जा सकते हैं।
📌 यह वोटरों के लिए सही है या गलत?
पक्ष | विवरण |
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✅ सकारात्मक पहलू (फायदा): |
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मृत और फर्जी वोटर हटने से चुनाव निष्पक्ष होता है।
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EVM या बूथ कैप्चरिंग जैसी समस्याओं में सुधार आता है।
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निर्वाचन आयोग को विश्वसनीयता बढ़ाने में मदद मिलती है।
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नए योग्य युवाओं को शामिल किया जा रहा है। |
| ❌ नकारात्मक पहलू (चिंताएं): | -
प्रवासी मजदूर, गरीब और ग्रामीण वोटरों के पास जरूरी दस्तावेज नहीं होने से नाम कटने का खतरा।
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कई को नोटिस की जानकारी नहीं मिली।
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राजनीतिक दलों का आरोप है कि यह जानबूझ कर वोट काटने का तरीका है, जिससे एक खास वर्ग प्रभावित हो।
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समयावधि बहुत कम दी गई, जिससे सत्यापन मुश्किल हो गया है। |
🏛️ राजनीतिक दृष्टिकोण से सरकार को क्या लाभ?
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विश्वसनीयता निर्माण: सरकार बता सकती है कि उसने चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने में अहम भूमिका निभाई।
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राजनीतिक लाभ: जिन क्षेत्रों में सरकार को नुकसान की आशंका है, वहाँ SIR के जरिए वोटर ट्रेंड को प्रभावित करने का आरोप लग रहा है।
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‘Foolproof Election’ Narrative: NDA और भाजपा दावा कर सकते हैं कि उनकी सरकार फर्जी वोटर हटाकर "ईमानदार लोकतंत्र" ला रही है।
⚖️ कानूनी स्थिति क्या है?
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इस पर सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है।
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विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने कहा है कि बिना पर्याप्त सूचना और अवसर के लाखों वोटर नाम हटाना असंवैधानिक है।
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SC ने निर्देश दिया है कि आधार, राशन कार्ड, वोटर आईडी को मान्य दस्तावेज माना जाए, और अंतिम फैसला 28 जुलाई 2025 को होने की संभावना है।
🧠 निष्कर्ष: SIR से क्या समझा जाए?
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प्रक्रिया का आदर्श उद्देश्य सकारात्मक है — मृत, दोहरे और गलत वोट हटाना।
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लेकिन प्रयोग और क्रियान्वयन में पारदर्शिता और समय-सीमा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
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अगर इसे सही तरीके से लागू किया जाए, तो यह भारत की चुनावी व्यवस्था को मजबूत कर सकता है। लेकिन अगर इसका इस्तेमाल राजनीतिक हथियार की तरह किया गया, तो यह लोकतंत्र को नुकसान भी पहुँचा सकता है।
लेखक: अजय मिश्रा | स्रोत: चुनाव आयोग, मीडिया रिपोर्ट, SC दस्तावेज
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